RDS dictation in hindi pdf download for steno for students #2
महोदय, सरकार की ओर से इन भाषा संस्थानों को विशेष संरक्षण तथा सुविधाएँ प्राप्त हैं। यह द्विभाषी केवल पर्यटन से जुड़े हुए हों, ऐसा नहीं है। दूसरी भाषा सीख कर ये अनुवाद कार्य करते हैं, प्रकाशन संस्थानों में, जन-संचार माध्यमों में तथा विज्ञान निकायों में प्रतिष्ठित अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं। ये सर्जनात्मक ललित साहित्य का अनुवाद करते हैं, विदेशी समाचारों का अपनी भाषा में तथा बल्गारिया के समाचारों का विदेशी भाषाओं में अनुवाद करते हैं। ये अनुवादक अपनी-अपनी भाषा के विशेषज्ञ माने जाते हैं। यदि आप कभी बल्गारिया जाएँ तो आप देखेंगे कि आप चाहे इनकी भाषा न जानते हों, किंतु अपकी भाषा जानने वाले आपको जरूर मिलेंगे। अभी कुछ महीने पहले की ही तो बात है, जब भारत के राष्ट्रपति डाॅ. शंकर दयाल शर्मा बल्गारिया गए। वहाँ बल्गारियावासियों ने हिंदी में उनका स्वागत किया और भारत संबंधी प्रश्न भी उन्होंने राष्ट्रपति जी से हिंदी में ही किए। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के लिए यह सुखद आश्चर्य था। वस्तुतः अनुवाद या भाषांतरण उनके लिए व्यावसायिक अनिवार्यता है। यूरोप के अन्य देशों में भी यही स्थिति है, जहाँ विश्व में प्रकाशित किसी भी भाषा का महत्वपूर्ण शोध निबंध, या कोई विदेशी चर्चित साहित्यिक कृति उस देश की भाषा में तत्काल अनूदित हो जाती है।
इतिहास साक्षी है कि ईसाई धर्म के प्रचार में अनुवाद की भूमिका कितनी महतवपूर्ण रही है। ईसाई धर्म के विश्वव्यापी प्रचार के लिए बाइबिल के अनुवाद की व्यापक योजना बनाई गई। अनुवाद ने ही बाइबिल को भारत के गाँव-गाँव, यहाँ तक कि आदवासी क्षेत्रों तक पहुँचा दिया। बाइबिल के बाद सबसे अधिक भाषाओं में और एक ही भाषा में कई वार भगवद्गीता का अनुवाद हुआ। भारतीय दर्शन और प्रतिभा को समझने की लालसा ने विदेशियों को प्रेरित किया कि वे गीता का अनुवाद अपनी भाषा में करें। आज विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में गीता का अनुवाद आपको मिलेगा। अवधि भाषा में लिखित रामचरितमानस भी देश और विदेश की अनेक भाषाओं में अनूदित होकर विश्व साहित्य का अनुपम ग्रंथ बन गया है। वस्तुतः अनुवाद ही वह माध्यम है, जो देशीय रचना को भौगोलिक सीमा से मुक्त कर विश्व-मंच पर प्रतिष्ठित करता है। गीतंजलि की ख्याति का एक प्रमुख कारण उसका विदेशी भाषाओं में अनूदित होना भी है। अनुवाद दो भाषाओं के मध्य सेतु का काम करता है और दो संस्कृतियों को निकट लालता है। अनुवाद की नींव है दो भाषाओं का ज्ञान और उन भाषाओं पर व्याकरण और शैली की दृष्टि से ऐसा पूर्ण अधिकार कि अनुवादक एक भाषा भाव व विचार राशि को दूसरी भाषा में पूर्णतः इस प्रकार रूपांतरित करे कि पाठक मूल रचना की संवेदना से भी परिचित हो सके तथा अनुवाद पढ़कर उसे मूल का सा आनंद भी मिल सके। यही लक्ष्य अनुवादक के लिए समस्या उत्पन्न करता है और इसी में उसके कौशल की पहचान भी होती है। स्रोतभाषा का ज्ञान अनुवादक के लिए इसीलिए अपरिहार्य माना जाता है।


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