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RSMSSB Dictation for steno students in hindi #1

RSMSSB Dictation for steno students in hindi




     ऋषिकुल परंपरा में विद्यार्थी राजनीति की दलदल से कोसों दूर रहते थे। आज के विद्यार्थी तो राजनीति की वारांगना से बेहद प्रेम करने लगे हैं। स्कूल और कॉलिजों में छात्र संघ के चुनाव राजनीति के आम चुनावों की तरह ही होते हैं। इन चुनावों में विद्यार्थी प्रत्याशियों का खूब जोर-शोर से नाम प्रचार किया जाता है। कॉलिज छात्र संघ के चुनावों में प्रत्याशियों का खूब पैसा भी खर्च होता है। धीरे-धीरे इन विद्यार्थियों की रुचि देशकी राजनीति से होने लगती है। वे लोक सभा तथा विधान सभा के चुनाव में भी रुचि दिखाने लगते हैं। राजनीति की दलदल उनके निश्चिंत, निष्कलंक जीवन पर काली चिंता सी छा जाती है। राजनीतिक प्रेम के कारण विद्यार्थियों को हड़ताल, तोड़-फोड़, जलसे, और जुलूस, नारेबाजी तथा जिंदाबाद और मुर्दाबाद करने का पाठ जल्दी ही सीखने को मिल जाता है।

    हमारे देश में स्कूल और कॉलिजों में पढ़ाई करने वाले कई छात्र-छात्राएँ ऐसे हैं जिनका विद्यार्थी जीवन प्रेम और वासना के आकर्षण का केंद्र बनकर रह गया है। वे व्यर्थ घूमने-फिरने, होटल तथा क्लबों में जाने में ही अपने समय का सदुपयोग समझते हैं। ऐसे छात्र-छात्राएँ अपने विद्यार्थी जीवन में ही विद्या की अर्थी को उठाने लगते हैं और ज्ञानार्जन के पवित्र कर्म को कामाग्नि में स्वाहा करने लगते हैं।
खेलकूल और शारीरिक व्यायाम विद्यार्थियों के जीवन के लिए आवश्यक समझा जाता है। इनसे उनका शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर बनता है, परंतु शारीरिक खेलों और शारीरिक व्यायामों में रुचि लेने के बजाय आज के विद्यार्थी टीवी, सिनेमा, सीडी, कंप्यूटर आदि इलेक्ट्राॅनिक चीजों तथा मानसिक प्रकार के व्यायामों में रुचि लेने लगे हैं। इनसे उनका शारीरिक विकास उचित प्रकार से नहीं हो पाता तथा शारीरिक व्याधियाँ तथा अनेक प्रकार के शारीरिक, मानसिक कष्टों को वे सहने लगते हैं।
टेलीविजन पर आजकल खूब मारधाड़ के दृश्य तथा अश्लील फिल्में दिखाई जाने लगी हैं जिसके कारण विद्यार्थी अपने जीवन में अनेक प्रकार की मानसिक विकृतियों का शिकार हो जाते हैं। उनके सोचने का नजरिया तथा जीवन का लक्ष्य ही बदल जाता है। घर-घर में छाया टीवी का कुप्रभाव विद्यार्थी जीवन के ऊपर एक कलंक तथा रोग की तरह हो गया है।


    यदि हम अपने देश के विद्यार्थी का जीवन स्तर तथा उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाना चाहते हैं तो हमें उनको टीवी के जरिए स्वस्थ और सात्विक प्रकार का मनोरंजन प्रदान करना चाहिए तथा विद्यार्थियों की रुचि शारीरिक खेलों में बढ़ानी चाहिए। देश के बहुत से नेता छात्र शक्ति का उपयोग अपने राजनीति लाभ के लिए करके उनके विद्यार्थी जीवन को खोखला बना रहे हैं। युवा विद्यार्थियों को इस मामले में तुरंत सचेत हो जाना चाहिए। उन्हें देश के किसी भी छोटे या बड़े नेता के हाथ की कठपुतली नहीं बनना चाहिए।

    आम नागरिक की तरह विद्यार्थियों को भी जीवन की तकलीफें तथा मुसीबतें सहनी पड़ती हैं। अपने परिवार की गिरती-उठती हाल से, आर्थिक दशाओं से, समाज के उत्थान और पतन से तथा शिक्षा एवं मनोरंजन के स्तर से विद्यार्थियों का जीवन भी प्रभावित होता है।
राष्ट्र के अन्य लाखों करोड़ों लोगों की तरह विद्यार्थियों का जीवन भी आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। विद्यार्थी आज अपने जीवन की मूल दिशा से भटककर भौतिक जगत की चकाचैंध अथवा आकर्षण में फंसता जा रहा है।
    विद्यार्थियों को अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए अथक लगन, परिश्रम, जीवनादर्श, ब्रह्मचर्य, एकाग्रता, संयमशीलता, धैय तथा सहनशीलता का पक्का व्रत लेना होगा, तभी वे विद्यार्थी जीवन की शाश्वत कसौटी पर और समय की कसौटी पर खरे उतर पाएँगे।


भारतीय परंपरा के चार आश्रमों में पहला आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम है। यह आश्रम खासतौर से विद्यार्थी जीवन के लिए ही निर्धारित है। बचपन से लेकर पच्चीस वर्ष तक की आयु तक यह आश्रम माना जाता है। इस आयु में व्यक्ति का स्कूल में दाखिला किया जाता है, वह प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों की पढ़ाई पूरी करके महाविद्यालय में दाखिला लेता है और कॉलिज शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी पाने के उद्देश्य से प्रतियोगी परीक्षाओं की पढ़ाई भी करता है।
    मनुष्य जीवन का प्रथम भाग विद्योपार्जन का काल होता है। इस स्वर्णिम काल में व्यक्ति विद्या के मूल्यों से अवगत होकर श्रेष्ठ नागरिक बनने की क्षमता और सामर्थ्य प्राप्त करता हहै।
स्कूल और कॉलिजों में दाखिला लेने वाले प्रायः सभी छात्र-छात्राएँ विद्यार्थी ही होते हैं लेकिन इनमें आदर्श विद्यार्थी बहुत कम होते हैं।

आदर्श विद्यार्थी वे होते हैं जो हमेशा अपने मन में सात्विक विचार रखते हैं अथवा शुद्ध संकल्प करते हैं। वे अपने पाठ्यक्रमों की पुस्तकों से, गुरुजनों के उपदेशों के श्रवण से तथा उत्तम पुस्तकों के स्वाध्याय से हमेशा श्रेष्ठ विचारों का संचय करते रहते हैं। क्षुद्र स्वार्थों और दुराग्रहों में फँसने की उनकी आदत नहीं होती। उनके मन, वाणी, कर्म में एकता होती है अर्थात् वे जो मन में सोचते या विचार करते हैं, उसको ही अपनी वाणी में लाते या मुख से कहते हैं तथा जो बात कहते हैं, उसको करके भी दिखाते हैं। मनसा वाचा कर्मणा की एकता के कारण वे अपने समाज में सबके विश्वासपात्र बन जाते हैं।
विद्यार्थी के जीवन का उद्देश्य विद्या की प्राप्ति करना है। आदर्श विद्यार्थी एकाग्र मन से अपने इसी लक्ष्य पर दृढ़ रहते हैं। वे नम्रता भाव के द्वारा अपने शिक्षक से विद्या की प्राप्ति करते हैं। जिस विद्यार्थी में नम्रता भाव नहीं होता, वह कभी भी शिक्षक की कृपा का पात्र नहीं बन पाता।


यदि कोई विद्यार्थी अपने अध्यापक के प्रति नम्रता भाव दिखाकर विषय से संबंधित प्रश्न अपने अध्यापक से बार-बार पूछेगा तो अध्यापक को जरा भी क्रोध नहीं आएगा, परंतु यदि वह नम्रताहीन होकर या उद्दण्ड भाव से कोई भी सवाल करेगा तो अध्यापक को क्रोधावेश आना मामूली बात होगी।
नम्रता को सद्गुणों की जननी या माता कहा जाता है। अपने से बड़ों के प्रति नम्रता दिखाना विद्यार्थी का कर्तव्य है। अपने समान या बराबर के लोगों के प्रति नम्रता भाव विनयशीलता का सूचक है और अपने से छोटों के प्रति नम्रता रखना कुलीनता का सूचक है।
आदर्श विद्यार्थी के जीवन में जिज्ञासा तथा सेवा भाव का भी बड़ा महत्व है। कहते हैं कि जिज्ञासा के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। जिज्ञासा तीव्र बुद्धि का स्थायी और निश्चित गुण है। विद्यार्थी के मन में अपने पाठ्यक्रम तथा पाठ्य पुस्तकों के प्रति जिज्ञासा का भाव पर्याप्त रूप से होना चाहिए तभी वह अपने विषय को हृदयंगम कर सकेगा और उसकी बुद्धि का भी समुचित रूप से विकास हो सकेगा।

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