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BIHAR ASI STENO 80 WPM DICTATION IN HINDI #1

BIHAR ASI STENO 80 WPM DICTATION IN HINDI #1



  संपूर्ण विश्व में एक चेतावनी, चिंतन और चेतना का दौर सा चल रहा है। चेतावनी का विषय है- पर्यावरण। चिंतन का विषय है- पर्यावरण प्रदूषण और चेतना का विषय है- पर्यावरण का संरक्षण। इन दिनों भौतिक-समृद्धि और पदार्थ-विज्ञान का विकास ही सुख की कुंजी बन गया है। मनुष्य अपनी विलासिता और आमोद-प्रमोद के लिए अतुल प्राकृतिक संपदा को नष्ट करने पर उतारू है। कटते जा रहे हैं वृक्ष, उजड़ते जा रहे हैं वन और बनते जा रहे हैं कंक्रीट के जंगल। भूजल स्तर गिरता ही जा रहा है। वे दिन दूर नहीं, जब हमें रेगिस्तान की चिलचिलाती धूप में प्यासा मरना होगा।

अहिंसा को पर्यावरण का विज्ञान भी कहा जाता है। अहिंसा के अनुसार वृक्ष को काटना उसकी हत्या करना है। हमारी संस्कृति में चैत्य, वृक्षों या वनस्थली की परंपरा रही है। चेतना जागरण में पीपल, अशोक, बरगद आदि वृक्षों का विशेष योगदान रहता हैं अहिंसा प्रवर्तक तीर्थंकर महावीर पर्यावरण पुरुष के रूप में भी जाने जाते हैं। महावीर के अहिंसा और अपरिग्रह सूत्र की महत्ता को आज भी पर्यवरण सुरक्षा, संरक्षण के संदर्भ में अस्वीकार नहीं किया जा सकता। लालच में मानव पर्यावरण को नुकसान पहुंचा कर अपने लिए सुविधाएं जुटाता है। महावीर की अहिंसा और अपरिग्रह सिद्धांतों से प्रकृति रक्षण का यह कार्य अपने आप होता है। आवश्यकता से अधिक संचय की अभिलाषा नहीं रखने का संकल्प अपरिग्रह है। अहिंसा कहती है कि जीवन और अजीव की सृष्टि में जो अजीव तत्व है, अर्थात मिट्टी जल, अग्नि, वायु और वनस्पति, उन सभी में भी जीव है। इन सबके अस्तित्व को अस्वीकार करने का मतलब हे अपने अस्तित्व को अस्वीकार करना। 

प्रत्येक प्रजाति मानव विकास के लिए अद्भुत वरदान सिद्ध होती है इसलिए महावीर की अहिंसा शाकाहर की हिमायत कर मांसाहार का निषेध करती है। महावीर का दर्शन बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय से बढ़कर सर्वजीत हिताय और सर्वजीव सुखाय तक है। इस पर आधारित अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था संसार की सभी अव्यवस्थाओं को पूर्ण करने में सक्षम है। महावीर के यह सूत्र पर्यावरण संरक्षण की मूल भावना से काफी गहराई से जुड़े हुए हैं। यह केवल राष्ट्र और शासन को नैतिक बने रहने तक ही सीमित नहीं बल्कि वातावरण को नियंत्रित करने, सूखा या अति वृष्टि न होने, संक्रामक रोगों के न फैलने वगैरह की भावनाओं से भाव-शुद्धि और समाज-सुख की बात दोहराता है।

मनुष्य पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण घटक है। यदि मनुष्य में विकार उत्पन्न होते हैं तो संपूर्ण पर्यावरण कलुषित हो उठता है। प्रकृति के दोहन और मनुष्य के शोषण के बिना अनावश्यक संग्रह संभव नहीं है। यही समाजिक प्रदूषण है। इससे सामाजिक समरसता, संतुलन और सौजन्य तीनों बिगड़ रहे हैं। 

SSC {C & D}, RSMSSB, HIGH COURT, RAILWAY, PARLIAMENT, RPORTER, DSSB, SSB, CRPF ASI, DRDO, BSF ETC. 

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