RSMSSB Dictation for steno students in hindi #3
भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। व्यक्ति का मन और संपूर्ण सामाजिक जीवन अपने पूरे राग-रंग, रीति-रिवाज, परिवेश, परंपरा, सरोकार, सभ्यता एवं संस्कृति के साथ भाषा में ही मुखर होते हैं। इसीलिए भाषा व्यक्ति के साथ-साथ पूरे समाज की पहचान तथा धरोहर होती है। इसीलिए भाषा और समाज का संबंध एक-दूसरे पर अवलंबित एवं अन्योन्याश्रित होता है। इसीलिए आज के विश्वग्राम में जब कोई भाषा पिछड़ जाती है और अपने बोलने वाले समाज द्वारा त्याग दी जाती है, तब केवल एक भाषा का ही देश निकाला नहीं होता, बल्कि उस भाषा को बोलने वाला पूरा समाज पराई भाषा पर आश्रित एवं अवलंबित हो जाता है। ऐसा समाज अपनी पहचान खोकर नकलची और दोयम दर्जे का समाज बन जाता है। आज दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले न जाने कितने मानव समाज आधुनिक बनने की होड़ में अपनी भाषाई पहचान खोकर नकलची बन गए हैं।
मानव इतिहास के एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले 200 वर्षों में केवल अफ्रीका में ही लगभग एक हजार भाषाएं लोक व्यवहार से वंचित होने के कारण मिट गईं। यूनेस्को के वियाना सम्मेलन 1996 की रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा दौर में दुनिया में प्रचलित लगभग 6800 भाषाओं और बोलियों में से कोई न कोई भाषा अथवा बोली हर पखवाड़े अपने बोलने वाले समाज द्वारा छोड़ दिए जाने से विलोप का शिकार हो रही है। यह सिलसिला अगर जारी रहा तो दुनिया में बोली जा रही भाषाओं और बोलियों में से चौथाई आने वाले कुछ वर्षों में खत्म हो जाएंगी। मतलब साफ है कि भाषा और समाज का संबंध आदमी की पहचान और संस्कृति से संबद्ध होने के साथ-साथ उपयोगिता आधारित भी होता है।विकास की दौड़ में जो भाषा अपने बोलने वालों को बेहतर जीवन सुलभ नहीं करा पाती, उस भाषा को उसका बोलता समाज छोड़ देता है। वैसे अपनी भाषा को हीन मानते हुए उसे छोड़ देना और पराई भाषा को सफलता की कुंजी समझकर अपना लेने का सिलसिला मानव समाज के लिए कोई नया नहीं है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार अपनी भाषाओं को भूलने में भारत का नंबर अव्वल है। भारत के बाद अमेरिका का नंबर है।
भाषा और समाज का रिश्ता द्वंद्वात्मक और बहुआयामी होता है। एक भाषा की मौत का मतलब है उसके वक्ता समाज की धरोहर और संस्कृति का खत्म होना, मानव सभ्यता की एक विशिष्ट पहचान का मिट जाना और एक समूचे समाज का नकलची और पिछलग्गू बन जाना। ऐसा समाज गुलाम बनने को अभिशापित होता है। इसीलिए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भाषा के सवाल को आजादी की लड़ाई से जोड़ा। उनका मानना था, राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा होता है।
अकारण नहीं यूनेस्को ने 21 फरवरी के दिन को विश्व मातृभाषा दिवस घोषित किया है। दुनियाभर में भाषाएं और बोलियाँ जिस तेजी से मिट रही हैं, अगर यही हाल रहा तो हमारी बहुभाषी तथा बहुलतामूलक दुनिया एकभाषी बनकर विविधता विहीन, परंपरा तथा धरोहर से वंचित एकरस, एकरंगी और उबाऊ हो सकती है।
भारत में भाषा के साथ समाज का व्यवहार और सरोकार बिल्कुल अलग तरह का रहा है। भाषाएँ हमारी आकांक्षा और प्रगति को कदम दर कदम साकार करने में सक्षम रही हैं किंतु शताब्दियों की गुलामी ने हमारी भाषा, शिक्षा, संस्कृति, चिंतन और स्वभाव को इस कदर कुंद कर दिया कि हम हीन भावना से ग्रस्त हो अपनी चीजों को हेय और विदेशी चीजों को श्रेष्ठ समझने लगे। हमारे भाषा व्यवहार पर विदेशी भाषाएं थोपी गईं। हमारी शिक्षा में, शासन के कामकाज में, यहाँ तक कि नैसर्गिक न्याय प्रणाली में विदेशी भाषाओं का चलन शुरू हुआ और हम अपनी भाषाओं की तुलना में विदेशी भाषाओं, विशेषकर अंग्रेजी को श्रेष्ठ मानने के लिए विवश किए गए।
अकारण नहीं यूनेस्को ने 21 फरवरी के दिन को विश्व मातृभाषा दिवस घोषित किया है। दुनियाभर में भाषाएं और बोलियाँ जिस तेजी से मिट रही हैं, अगर यही हाल रहा तो हमारी बहुभाषी तथा बहुलतामूलक दुनिया एकभाषी बनकर विविधता विहीन, परंपरा तथा धरोहर से वंचित एकरस, एकरंगी और उबाऊ हो सकती है।
भारत में भाषा के साथ समाज का व्यवहार और सरोकार बिल्कुल अलग तरह का रहा है। भाषाएँ हमारी आकांक्षा और प्रगति को कदम दर कदम साकार करने में सक्षम रही हैं किंतु शताब्दियों की गुलामी ने हमारी भाषा, शिक्षा, संस्कृति, चिंतन और स्वभाव को इस कदर कुंद कर दिया कि हम हीन भावना से ग्रस्त हो अपनी चीजों को हेय और विदेशी चीजों को श्रेष्ठ समझने लगे। हमारे भाषा व्यवहार पर विदेशी भाषाएं थोपी गईं। हमारी शिक्षा में, शासन के कामकाज में, यहाँ तक कि नैसर्गिक न्याय प्रणाली में विदेशी भाषाओं का चलन शुरू हुआ और हम अपनी भाषाओं की तुलना में विदेशी भाषाओं, विशेषकर अंग्रेजी को श्रेष्ठ मानने के लिए विवश किए गए।

भला हो स्वाधीनता आंदोलन का, जिसने गाँधी जी के नेतृत्व में स्वदेशी और स्वभाषा के प्रति भारत के सोए हुए आत्मसम्मान को जगाया। स्वाधीनता और हिंदी एक दूसरे की पूरक बनी। हिंदी स्वतंत्रता संग्राम की चेतना और अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। इसका परिणाम हुआ कि देश जब आजाद हुआ तो हिंदी को भारत के संविधान में राजभाषा का दर्जा दिया गया। किंतु तभी हिंदी में राजकाज के लिए ढाँचागत सुविधा नहीं होने की बात कह कर वैकल्पिक व्यवस्था होने तक अंग्रेजी में काम करने की कामचलाऊ व्यवस्था शुरू हुई। यह कामचलाऊ व्यवस्था हमारे संघीय ढाँचे का एक तरह से स्थायी स्वभाव बन गई है। आज भी भारत संघ के कामकाज की भाषा वही है, जो अंग्रेजी हुकूमत की भाषा थी। संवैधानिक प्रावधानों के निर्वाह के लिए हिंदी एक तरह से अनुवाद की भाषा बनकर रह गई है।
वैसे अनुवाद भाषाओं के बीच संवाद जोड़ने और ज्ञान का प्रसार करने के कारण स्वभाव से आधुनिक होता है। अनुवाद सृजन का अनुसृजन होने के चलते सर्जनात्मक और अभिनव अनुशासन है। परंतु अनुवाद शब्दांतर और वाक्यांतरण होने पर जटिल और बोझिल हो जाता है। प्रशासन में जो हिंदी चलती है, उसका अधिकांश मौलिक लेखन नहीं, बल्कि अनुवाद है। इसलिए प्रशासनिक हिंदी को कुछ लोग तंज से अनुवादी हिंदी भी कहते हैं। ऐसा इसलिए कि प्रशासनिक हिंदी में सरलता और सहजता के बजाय प्राय: जटिलता मिलती है।
प्रशासनिक हिंदी में जो पारिभाषिक शब्द प्रयोग होते हैं, उसका अधिकांश संस्कृतनिष्ठ है और मानक को ध्यान में रखकर गढ़े गए हैं। ऐसे शब्द आम जन जीवन की बोली-वाणी में नहीं होते। फलस्वरूप प्रशासनिक हिंदी सामान्य हिंदी से भिन्न है। वैसे प्रशासनिक हिंदी भाषा की यह भिन्नता कोई दोष नहीं है। दुनिया की सभी भाषाओं में प्रशासनिक, अकादमिक और बोलचाल के रूप अलग-अलग होते हैं। किंतु प्रशासनिक हिंदी की भिन्नता के कारण दूसरे हैं। प्रशासनिक हिंदी पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग के चलते आम लोगों के लिए कुछ हद तक कठिन हो सकती है, जो स्वाभाविक है। प्रशासनिक हिंदी प्रशासन के लोगों के लिए भी चुनौती है। इसका कारण प्रशासनिक अंग्रेजी के पाठों, मसौदों आदि का हिंदी में हूबहू, शब्द दर शब्द, वाक्य दर वाक्य अनुवाद करना है। ऐसा अनुवाद हिंदी भाषा की प्रकृति और स्वभाव के अनुरूप नहीं होता। इसमें हिंदी की स्वाभाविक वाक्य संरचना से भिन्न अंग्रेजी वाक्य रचना की नकल होती है। फलस्वरूप वाक्य जटिल, अटपटे और असंगत होते हैं। ऐसे अनुवादों में या तो अर्थ का लोप हो जाता है या अर्थ का अनर्थ। ऐसे में पाठक को खीझ के सिवा कुछ हासिल नहीं होता।

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