BIHAR ASI Hindi Dictation For Student In hindi #3
Lesson Start
मनुष्य हमेशा सुखों की आकांक्षा रखता है और उसके लिए वह अनेक कदम उठाता है, परंतु सत्य ज्ञान के अभाव में उसे ये पता नहीं चलता कि उसके वे कदम उसे सुखों मार्ग पर ले चलेंगे या दुखों की आँधी में धकेल देंगे। सुख हेतु इस सृष्टि के अविनाशी नियमों का उल्लंघन करते हुए मनुष्य सुखों के पीछे दौड़ रहा है परंतु सुख भी आगे-आगे उतनी ही तीव्र गति से दौड़े चले जा रहे हैं।
आस्तिक हो या नास्तिक, सभी को एक मत से यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि मन और बुद्धि ही जीवन के संचालक हैं। बुद्धि उसमें अन्तर्निहित विवेक के द्वारा निर्णय लेती है और मन सतत् संकल्प रचना में व्यस्त रहता है। मन में सबेरे है से रात्रि तक विचारों की अनेक धारायें फूटती हैं और प्रत्येक धारा मनुष्य के मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ती जाती है। कभी-कभी तो मनुष्य को यह पता भी नहीं चलता कि वह सारा दिन क्या सोचता है?
यदि बुद्धि, मन पर नियंत्रण नहीं रखती या बुद्धि, मन को यथार्थ दिशा नहीं दे पाती तो मन स्व-इच्छानुसार इधर-इधर भागने लगता है। पहले तो छोटे बच्चे की तरह उसे आनंद आता है, परंतु फिर गिरने पर चोट लगने से खिन्नता का अनुभव करने लगता है। यह भटकता मन स्वयं को कीचड़ के समान अनेक व्यर्थ संकल्प-विकल्पों का भंडार बना लेता है और फिर उससे उठने लगती है बदबू। फलस्वरूप मनुष्य अपने ही रचे हुए संकल्पों से परेशान रहने लगता है।
इस तरह मन अपनी शक्तियों को नष्ट करता हुआ तनाव का शिकार होने लगता है। आज यही स्थिति अनेक मनुष्यों की है। यों कहें कि तनाव की अग्नि घर-घर में जल रही हे, इसमें जीवन की सुख-शांति भी राख हो रही है। सुंदर जीवन पाकर यदि किसी का मन तनाव की लपटों में उलझता रहे तो यह जीवन के लिए बड़ा अभिशाप है। जीवन पाकर जिस मनुष्य ने जीवन को सुखी व संतुष्ट बनाना नहीं सीखा, उसका विवेक भला किस काम का?
चिकित्सा विज्ञान अब स्वीकार करने लगा है कि अधिकतर बीमारियों का कारण व उनमें वृद्धि मानसिक तनाव के कारण ही है। मन की प्रसन्नता से रोग मुक्त या रोग प्रभाव मुक्त जीवन जिया जा कसता है। आज मन की विकृति या वातावरणीय प्रदूणष हो ही भयंकर रोगों का जिम्मेवार माना जाएगा। मन जब तनावगस्त है, तब पाचन शक्ति क्षीण होने लगती है, ग्रन्थियाँ ठीक से काम नहीं करती, मस्तिष्क पर निरंतर दबाव बना रहता है और मनुष्य इस प्रकार अनेकानेक व्याधियों को आमंत्रित कर लेता है।
इतना ही नहीं ये मन का तनाव ही सामाजिक, पारिवारिक या व्यक्तिगत समस्याओं का भी मूल बन जाता है। प्रत्येक घर में कम से कम एक प्राणी तो ऐसा होता ही है जो अनेकों के मन में तनाव पैदा करता है। वो परिवार तो धन्य माना जाएगा जिसमें सभी शांत व शीतल स्वभाव वाले हों, नहीं तो एक मनुष्य के मन में उत्पन्न अशांति अपना प्रभाव पूरे समाज पर अवश्य डालती है। यह वर्तमान में चहूँ ओर प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है।


Welcome in forsteno.in