Date And Time

RSMSSB Hindi Dictation 100 WPM #5

RSMSSB Hindi Dictation 100 WPM #5


Lesson Start

 आदर्श विद्यार्थी के जीवन में जिज्ञासा तथा सेवा भाव का भी बड़ा महत्व है। कहते हैं कि जिज्ञासा के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। जिज्ञासा तीव्र बुद्धि का स्थायी और निश्चित गुण है। विद्यार्थी के मन में अपने पाठ्यक्रम तथा पाठ्य पुस्तकों के प्रति जिज्ञासा का भाव पर्याप्त रूप से होना चाहिए तभी वह अपने विषय को हृदयंगम कर सकेगा और उसकी बुद्धि का भी समुचित रूप से विकास हो सकेगा।

जिस व्यक्ति के अंदर किसी चीज को सीखने की ललक या जिज्ञासा होती है, उसके अंदर एकाग्रता भी आ जाती है। जब विद्यार्थी की जिज्ञासा या रुचि केवल अपनी पुस्तक के विषय के अध्ययन की तरफ ही रहती है तो वह बिना किसी रुकावट के अपना पाठ पढ़ता रहता है और पाठ के विषय को अच्छे ढंग से समझ लेता है, परंतु जब उसका ध्यान अपनी पुस्तक से हटकर किसी दूसरे विषय में लग जाता है तो उसका मन पढ़ाई से बार-बार भटकता रहता हहै और सहज रूप रूप से एकाग्र नहीं हो पाता।

एक कहावत है कि सेवा करने से ही मेवा या श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है। विद्यार्थी को चाहिए कि वह अपने सेवा-सत्कार से गुरुजनों को प्रसन्न रखे। तभी वह सहज रूप से उनसे विद्या की मेवा प्राप्त कर सकेगा। आजकल ट्यूशन की फीस देकर या उनका कोई छोटा-मोटा काम करके विद्यार्थी अपने शिक्षक को प्रसन्न रखते हैं। धन से या किसी अन्य तरीके से अध्यापक को लाभ पहुँचाना ही उनकी सेवा करना है। जिन विद्यार्थियों को अपने शिक्षक, अध्यापक या गुरुजनों की सेवा करनी नहीं आती, वे कभी उनकी कृपा का पात्र नहीं बन सकते। संस्कृत में कहा गया है कि विद्या गुरु की सेवा से या गुरु को पर्याप्त धन देकर अर्जित की जा सकती है।
संयमयुक्त आचरण विद्यार्थी का प्रथम आदर्श है। जिन विद्यार्थियों के आचरण में संयम नहीं होता, वे कभी अपने शिक्षाकर्म में और जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। विद्यार्थियों को अपने खान-पान, खेल-कूद, पढ़ाई-लिखाई तथा निद्रा-विश्राम में पूर्ण संयम बरतने की जरूरत है। आदर्श विद्यार्थी वह है जो अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ खेलकूद और व्यायाम का भी ध्यान रखता है। इससे उसका मानसिक तथा बौद्धिक विकास होने के साथ-साथ शारीरिक विकास भी होता रहता है। लेकिन जिस प्रकार अपनी बौद्धिक या मस्तिष्क क्षमता से ज्यादा पढ़ाई में मेहनत करना हानिकारक है, इसी प्रकार जरूरत से ज्यादा खेलना-कूदना भी विद्यार्थियों के जीवन को नुकसान पहुँचाता है।
एक आदर्श विद्यार्थी रात्रि को जल्दी सोकर प्रातः शीघ्र उठता है। आमतौर से वह रात को दस बजे सोकर सुबह चार बजे ही उठ जाता है। इस प्रकार कुल छह घंटों में उसे सुखदाई नींद तथा पूर्ण विश्राम प्राप्त हो जाता है। प्रातःकाल शीघ्र उठकर सद्बुद्धिदाता परमेश्वर परमपिता परमात्माको याद करना श्रेयस्कर है। इससे विद्यार्थीद्य के मन को असीम सुख, शांति एवं आनंद का अनुभव होता है। इसके बाद उसे अपना ध्यान पढ़ाई में लगाना चाहिए। दस-पंद्रह मिनट प्रभु का स्मरण करके वह पूरे डेढ़ या दो घंटे तक अपनी पढ़ाई कर सकता है। आदर्श विद्यार्थी की दिनचर्या में भी संयम होता देखा जाता है। प्रातः छह बजे तक अपने अध्ययन आदि कार्य से निवृत्त होने के बाद उसे शौच तथा स्नानादि नित्यकर्मों के लिए जाना चाहिए। तत्पश्चात् नाश्ता या भोजन करके वह पढ़ने के लिए अपनी अध्ययनशाला में जाए तथा स्कूल अथवा कॉलिज में मन लगाकर अपनी पढ़ाई करे। शाला में अध्यापक जिन पाठों को पढ़ाते हैं, उन्हें बड़े ध्यान से सुनना और समझना चाहिए। जिन विद्यार्थियों का ध्यान कक्षा की पढ़ाई में न होकर इधर-उधर की बातों में होता है, वे अपने विषय के पाठ को ठीक ढंग से नहीं समझ पाते। यही कारण है कि उनको परीक्षाओं के दिनों में बहुत मेहनत करनी पड़ती है।
स्कूल से घर लौटने के बाद स्कूल में दिए हुए गृहकार्य को पूरा किया जाता है लेकिन इससे पहले विद्यार्थी को कुछ भोजन आदि करके कुछ क्षण विश्राम करना चाहिए ताकि विद्यार्थी स्कूल की थकान को भूलकर कुछ ही समय में अपने आपको तरोताजा तथा स्वस्थ महसूस कर सके। इस हेतु कुछ देर खेलना-कूदना भी लाभकारी होता है। तत्पश्चात् कम से कम दो घंटे अपने गृहकार्य में लगाने चाहिए। शाम को भोजन, नाश्ता आदि करके एक-आध घंटा मनोरंजन करने या सड़क पर टहलने के बाद फिर रात्रि को सोने से एक-दो घंटे पूर्व पढ़ने में मन लगाना चाहिए। इस प्रकार पढ़ाई के साथ-साथ खेल-कूद और मनोरंजन का भी ध्यान रखने से विद्यार्थी अपने सर्वांगीण विकास को प्राप्त कर सकेंगे।
कहते हैं कि अधिक भोजन करने से आदमी साँड बन जाता है, अधिक खेलने-कूदने से वह अशिक्षित ही रह जाता है और अधिक पढ़ने से व्यक्ति किताबी कीड़ा बन जाता है। संस्कृत साहित्य में विद्यार्थी के पाँच गुण बताए गए हैं। विद्यार्थी को परिश्रमी होना चाहिए।
परिश्रम से ही व्यक्ति को हर कार्य में सफलता मिलती है। यदि विद्यार्थी अपनी पढ़ाई में मेहनत करेगा तो उसे परीक्षाओं में सफलता अवश्य मिलेगी। स्वाध्याय से तात्पर्य स्वयं का अध्ययन है। इस तरह के अध्ययन में विद्यार्थी खुद ही विषयवस्तु को पढ़कर पुस्तक से दिशा-निर्देश प्राप्त करता है। जब परीक्षाओं के दिन आते हैं तो स्कूल अथवा काॅलिजों की छुट्टियाँ आ जाती हैं तथा विद्यार्थियों को खुद ही समझकर परीक्षाओं की तैयारी करनी पड़ती है। किसी जटिल विषय को समझने के लिए उन्हें एक से अधिक पुस्तकों का सहारा लेना पड़ता है।
जब छात्र स्वयं किसी विषय का अध्ययन करता है तब उसे अपने अज्ञान का पता चलता है। अपने विषय के पाठ को वह आसानी से समझ लेता है। स्वाध्याय के जरिए विद्यार्थी को विद्या के आनंद की प्राप्ति होती है तथा उसके अंदर शिक्षा विषय के संबंध में विशेष योग्यता आती है।

जो एक भी क्षण नष्ट करता है, उसे विद्या प्राप्त नहीं हो सकती है। संस्कृत में कहा गया है कि आलस्य करने से विद्या कहाँ प्राप्त होती है। बिना विद्या के धन कहाँ प्राप्त होता है। बिना धन के मित्र कहाँ मिलते हैं और बिना मित्रों के सुख कैसे मिल सकता है?
विद्यार्थी को आलस्य में अपने जीवन का अमूल्य समय बर्बाद नहीं करना चाहिए तथा न ही बेकार की गप्पें हाँकने, बेकार घूमने, सिनेमा के अभिनेता-अभिनेत्रियों की चर्चाएँ करने तथा व्यर्थ की निंदा स्तुति में अपने समय को गँवाना चाहिए।

SSC {C & D}, RSMSSB, HIGH COURT, RAILWAY, PARLIAMENT, RPORTER, DSSB, SSB, CRPF ASI, DRDO, BSF ETC. 

You can visit our website for all these dictations and outlines.

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.