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लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारधारा की राजनीति इतनी पेशेवर हो जाएगी, शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। पहले गोवा, मणिपुर, कर्नाटक और अब मध्यप्रदेश में सत्ता हथियाने के लिए खेले जाने वाले खेल समूचे देश के लिए आश्चर्य का विषय बने हुए है। यों तो जोड़-तोड़ की इस राजनीति का इतिहास काफी लंबा है, लेकिन पिछले कुछ समय से राज्यसभा चुनाव की सीटें जीतने के लिए जो दाव-पेंच चले जा रहे हैं, उन्होंने लोकतंत्र को शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। गुजरात में काॅंग्रेस के पाँच विधायकों का विधानसभा से इस्तीफो दे देना कोई छोटी घटना नहीं है। इससे पहले भी राज्यसभा चुनावों के दौरान गुजरात सुर्खियाँ बटोर चुका है। एक सीट के लिए दर्जनों विधायकों को दूसरे राज्यों में भेज कर बाड़ाबंदी करने की परिपाटी अब स्थायी होती जा रही है। गुजरात में संख्याबल के आधार पर भाजपा काँग्रेस को दो-दो सीटें मिलना तय था। लेकिन भाजपा के तीसरे प्रत्याशीर के मैदान में उतरने से खरीद-फरोख्त का खेल नया रूप ले रहा है। जिन मतदाताओं ने इन पाँच विधायकों को काँगेस प्रत्याशी के रूप में जिताया, क्या ये इस्तीफे उनका अपमान नहीं माना जाएगा? हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधि अगर मतदाताओं के विश्वास पर खरे नहीं उतर सकते तो आमजन से लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवित  रखने की उम्मीद क्यों की जाए? यहाँ राज्यसभा की एक एक सीट जीतने की बात नहीं, बात रानीतिक प्रतिशोध की लगती है। गुजरात में राज्यसभा के पिछले चुनाव में प्रतिष्ठा की लड़ाई में काँग्रेस के अहमद पटेल ने भाजपा को मात दी थी। लगता है कि भाजपा वह हार अभी तक नहीं पचा पाई है। पाँच विधायकों के इस्तीफे पिछली हार का हिसाब चुकाने की रणनीति का हिस्सा जान पड़ती है।

भाजपा, आज सत्ता में है और जीत के लिए कुछ भी करने से नहीं चुक रही। लेकिन कल उसके विपक्ष में भी बैठना पड़ सकता है। यही खेल जब काँग्रेस या कोई और दल अपनाएगा तो उसे लोकतंत्र याद आएगा। 26 मार्च को होने जा रहे राज्यसभा चुनावों को लेकर बात अकेले गुजरात तक सीमित नहीं है ऐसी ही उठापटक हरियाणा, झारखंड और मध्यपदेश में भी दोहराई जा सकती है, जहाँ एक-एक के लिए जोड़-तोड़ के नए-नए पैंतरे दोनों ओर से चले जा रहे है। बात अगर सिद्धांतों की टकराहट की जगह मूँछों की लड़ाई तक पहुँच जाए तो और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? एक तरफ चुनाव आयोग कम खर्च में चुनाव की पैरवी करता है। दूसरी तरफ विधायको को लाने-ले जाने के लिए चार्टर विमानों और महंगे होटलों पर करोड़ों रुपए फूँके जा रहे हैं। लेकिन इस खेल को रोकने वाला कोई नहीं। क्या खरीद-फरोख्त और आयाराम-गयाराम के इस खेल से लोकतंत्र मजबूत होगा? लोकतंत्र में नैतिकता के लिए कोई जगह बचेगी या नहीं? ये सवाल जितने गंभीर हैं, जवाब देने वाले उतने गंभीर नही लगते।

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