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माननीय अध्यक्ष जी, आज बहुत ही गंभीर विषय पर सदन चर्चा कर रहा है। महंगाई से आम जनता, गरीब जनता की कमर टूट जाती है। जब से हमारा देश आजाद हुआ है, हम महंगाई पर लगाम नहीं लागा सके हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नव जनपद से चुनकर आता हूँ, जिसने देश की आजादी की लड़ाई में बहुत अहम भूमिका निभाई। वहाँ से महान स्वतन्त्रता सेनानी श्री चन्द्रशेखर आजाद हुए और हमारे देश के महान कवि शुक्ल जी भी हुए हैं।
अध्यक्ष महोदय, यह हमारे देश की अस्मिता का सवाल है। यदि हम गरीबों को उनके हक की, उनके जरूरत की चीजें नहीं दे पाए तो हिन्दुस्तान पर राज करने का किसी को अधिकार नहीं है, फिर चाहे इधर के बैठने वाले लोग हों, या उधर के बैठने वाले लोग हों।
महोदय, हमने आजादी की लड़ाई इसलिए नहीं लड़ी थी कि गरीब जनता को पेट्रोल पचास रुपये लीटर और दालें 52 रुपये किलो मिलें। ये चीजें आम जनता की पहुँच से बाहर चली जाएँ और हम सीता के बंद मर्तबानों में सहज कर रखते जाएँ। हम भी मजबूर हैं क्योंकि हम इस प्रक्रिया को रोक नहीं पा रहे हैं, इस पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं।
लोग वोट देते हैं, सरकारें आती हैं और चली जाती हैं। इनकी सरकार आइ और चली गई। जिसे आना है, उसे जाना भी है, यही प्रकृति का नियम है। कोई रोक नहीं सका है, उन बिचैलियों और व्यापारियों को, जो हमारे बीच में घुन का काम करते हैं, हमारी आम जनता की कमर को तोड़कर घुन की तरह खोखला कर रहे हैं।
हमारे देश में गेहूँ इतना पैदा होता है कि हम विदेशियों को भी खाने के लिए दे सकते हैं। हमारे राज्य में केन्द और राज्य सरकार ने गेहूँ खरीदने के लिए केन्द स्थापित किए हैं, लेकिन वहाँ से विदेशी कंपनियों ने 800 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूँ खरीदा और उसी कंपनी से हमने आॅस्ट्रेलिया से 1000 और 1100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूँ आयात किया। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इसे रोकने के लिए कोई कानून नहीं है। इसके लिए किसी की जिम्मेदारी तय नहीं होती है।
पाँच साल बाद, इस सदन में जब तक जनता किसी सरकार की जिम्मेदारी तय करती है, तब तक ट्रेन बहुत आगे निकल चुकी होती है, समय निकल चुका होता है। जनता विरोध करती है, लेकिन तब तक दूसरे लोग आ जाते हैं, और वे दूसरी बंदरबाँट में लग जाते हैं। इसलिए हमें जिम्मेदारी तय करनी पड़ेगी। ऐसे कुछ लोग हैं, जिन्होंने विदेशी कंपनियों को गेहूँ खरीदने दिया। सभी सदस्यों ने कहा कि वे कौन लोग थे, जिन्होंने विदेशी लोगों को इस धरती पर सस्ता गेहूँ खरीदने दिया, विदेश से महंगा गेहूँ मंगाया और हमारी गरीब जनता पर वह भारी पड़ा क्योंकि जनता का पैसा है, हम लोग राजा नहीं है, यह राजतंत्र नहीं हैं, सब कुछ जनता का है। जनता का कमाया हुआ धन जनता के हित में ही लगा देना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य का विषय हे कि हम इस दिशा में कोई मजबूत कदम नहीं उठा पाए। जिस तरह महंगाई बढ़ती जा रही है, वह चिंताजनक है। मुख्य मुद्दा पेट्रोलियम पदार्थों का है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो दाल की, गेहूँ की, सीमेंट की, इस्पात की, ईंट की, करीब आदमी जो चीजें उपयोग करता है, उन सबके दाम बढ़ जाते हैं।
मैं अब अपने दिल की बात कहना चाहता हूँ। जो मेरा दिल कहेगा, वही मैं कहने जा रहा हूँ। जब राजा निकलता था तो उसके चेहरे से कुछ बातें झलकती थीं। आप आज कुर्सी पर बैठे हैं, सदन की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठे हैं, आपके चेहरे पर हमारे प्रति प्यार झलकता है तो गुस्सा भी झलकता है। लेकिन दुख का विषय है कि जिन हाथों में आज महंगाई रोकने की क्षमता है, उनके चेहरे से आप नहीं जान सकते कि उनके चेहरे पर क्या लिखा है और दिल में क्या लिखा है, यह दुर्भाग्य का विषय है। यह मैं अपने दिल की बात कहता हूँ। संसद सदस्य लाखों जनता के वोट लेकर यहाँ आते हैं। यह लोगों का सदन है, लोगों की आवाज लेकर जब हम जैसा कोई व्यक्ति सरकार के पास जाता है तो उसकी आवाज नहीं सुनी जाती। चिट्ठी भेजने पर जवाब आता है कि चिट्ठी प्राप्त हो गई है, चिट्ठी उचित कार्रवाई के लिए भेज दी गई है। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि अगर महंगाई का मुद्दा सामने आता है, पैट्रोलियम की कीमतों में वृद्धि के सवाल पर पीछे बड़ा आन्दोलन हुआ, सब लोगों ने अपने बातें मजबूती के साथ रखीं, लेकिन अगर सरकार पैट्रोल के दाम नहीं बढ़ाती, एक्साइज डयूटी घट जाती। शराब के दाम घटाए गए, कम्प्यूटर के दाम घटाए गए, मोबाइल के दाम घटाए गए, इसकी क्या आवश्यकता थी? हम मोबाइल खाकर जिन्दा नहीं रह सकते। यदि किसानों को मजबूत नहीं किया जाएगा, आम आदमी को मजबूत नहीं किया जाएगा तो एक दिन हिन्दुस्तान में ऐसा आएगा, जब आम जनता, आम नौजवान खड़ा होकर एक-दूसरे की गरदनें काटेगा क्योंकि उसे पता है कि कल को हमारा नंबर लूटने में नहीं आने वाला है। आज हिन्दुस्तान का नौजवान शांत इसलिए बैठा है क्योंकि उसे पता हे कि सांसदों की तरह हम भी हाउस में जीतकर जाएंगे और हमार नंबर भी लूटने में आएगा। यह दूख का विषय है। इन सब चीजों पर हमें कंट्रोल करना पड़ेगा और जब तक कंट्रोल आपके माध्यम से नहीं होगा, सरकार मूल्यों को नियंत्रित करने के लिए आयोग नहीं बनाएगी। साबुन पाँच रुपये से 12 रुपये, पैट्रोल 27 रुपये से 52 रुपये, दालें 25 रुपये से 42 रुपये हो गईं, जिन्हें आम आदमी खरीद नहीं सकता।


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