editorial dictionary | editorial dictation | editorial dictation Hindi 80 wpm
Lesson Start
निर्भया कांड के चारों दोषी आखिरकार फाँसी के फंदे पर चढ़ा दिए गए। इस तरह पिछले सात साल से भी ज्यादा समय से चला आ रहा यह मामला अपने मुकाम तक पहूँचा, जिससे न सिर्फ पीड़िता के परिजनों ने बल्कि देश भर के उन तमाम लोगों ने राहत की साँस ली है, जो इस हादसे के बाद सड़क पर स्त्री की सुरक्षा और सम्मान को लेकर चिंतित थे। हालाँकि उनके भीतर इस बात की कसक भी है कि न्याय मिलने में सात साल से भी ज्यादा का वक्त लग गयां दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 की रात चलती बस में निर्भया के साथ छह लोगों ने सामूहिक बलात्कार और क्रूरता की अति कर दी थी, जिससे हफ्ते भर जूझने के बाद उसकी मौत हो गई थी।
बलात्कारियों में से एक के नाबालिग होने की वजह से उस पर जूवेनाइल के तहत मामला चला जबकि एक ने लेल में आत्महत्या कर ली। बाकी चारों दोषियों ने फाँसी से बचने के लिए सभी संभव कानूनी विकल्पों का पूरा इस्तेमाल किया और गुरूवार की रात तक इस मामले की सुनवाई चली। इन चारों को फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद तीन बार सजा की तामील के लिए तारीखें तय हुई लेकिन फाँसी टलती गई।
लोगों में इस देरी से गुस्सा था लेकिन अंततः शुक्रवार की सुबह उन्हें फाँसी दे दी गई। निर्भया कांड के बाद देश में जबर्दस्त आक्रोश फैला और महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर एक आंदोलन की शुरूआत हो गई। सरकार पर महिमाओं की सुरक्षा को लेकर बने कानूनों को सख्त रूप देने का दबाव बढ़ा। आखिरकार इस संबंध में सु़झाव देने के लिए जस्टिस वर्मा कमिटी का गठन किया गया। इस समिति की चिफारिशों के अनुरूप कई नियम-कायदे भी बने। लेकिन कुल मिलाकर हालात अब भी ज्यादा नहीं बदले हैं। बलात्कार के मामले पहले से कुछ बढ़ गए हैं। अलबत्ता इस बीच इतना जरूर हुआ है कि पहले से ज्यादा महिलाएँ अपने साथ हुए अत्याचार की सूचना देने सामने आ रही हैं। पुलिस भी दकम से कम बड़े शहरों में उनकी शिकायत पर पहले से ज्यादा ध्यान देने लगी है। लेकिन अपराधियों को दोषी ठहराए जाने की दर आज भी पुराने मुकाम पर ही अटकी हुई है। रेप के मामलों में आज भी 27 फीसदी आरोपियों को ही सजा हो पा रही है। दोषी बड़ी संख्या में छूट जा रहे हैं। पुलिस अब भी ऐसे सबूत जुटाने में अक्षम है जो सुनवाई के दौरान ठोस साबित हों। जब यौन अपराधों पर नया कानून पारित हुआ था तो सरकार ने वादा किया था कि पुलिस को जाँच की आधुनिकतम तकनीकों से लैस किया जाएगा। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो यह अब तक नहीं हुआ है। कमियाँ और भी कई स्तरों पर हैं। असल बात हमारे सिस्टम को महिलाओं के मामले में संवेदनशील ओर मुस्तैद बनाने की है, ताकि सजा दिलाने की दर में वृद्धि हो। सजा कितनी मिलती है? इससे ज्यादा अहम बात यह कि सजा कतनी जल्दी मिलती है। जल्दी न्याय होने से ही अपराधियों में खौफ पैदा होगा।


Welcome in forsteno.in