RDS Hindi Dictation उच्च गति अभ्यास हिंन्दी डिक्टेशन आशुलिपी #4
भाइयो और बहनो, मतलब यह है कि अगर संसार को सहनशील बनाना है तो सभी लोगों को दुनिया भर में हिंदी भाषा का प्रचार और प्रसार करना चाहिए। ज्यादातर व्यापार के लिए कच्चा माल तो किसान ही पैदा करता है। फिर किसान के लिए कृषि अनुसंधान के खर्च में दुनिया भर में कटौती क्यों की जा रही है। कटौती करनी है तो बहुत-से और क्षेत्र भी हैं। अमीर देश सन् 1990 में खेती-बाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए जो सहायता दे रहे थे वह थी 12 अरब डालर और दस साल बाद 2000 में 2 अरब डालर की कटोती कर दी और यह 10 अरब डालर रह गई। तो पूरी दुनिया को खेती-बाड़ से जोड़ने की जरूरत है, तभी ये दुनिया आपस में लड़ना-मरना बंद करेगी। मेरा बस चले तो, मैं तो हिमालय की सबसे ऊँची चोटी ‘सगरमाथा‘ जिसे दुनिया ‘एवरेस्ट‘ कहती है पर चढूँ और पूरे जोर से आवाज लगाऊँ कि ऐ धरती के वासियो बंदूकें छोड़ो और हल उठाओ। नहीं तो आप ही सोचो कि 20 साल बाद 2020 में जब दुनिया की आबादी 8 अरब हो जाएगी तो सबको खिलाने लायक खाद्यान्न कैसे उपलब्ध होगा। उस समय चीन को भी बाहर से गेहूँ मँगाना पड़ेगा। सौभाग्य से भारत के बारे में तो कृषि विशेषज्ञों का यही अनुमान है कि भारत के किसान और कृषि वैज्ञानिक मिल-जुलकर बढ़ी हुई आबादी का भी पेट भर पाएँगे।

आज हमारे अन्न भंडार में साढ़े तीन करोड़ टन से ज्यादा अनाज भरा है रबी की फसल आने के बाद यह बढ़कर पाँच करोड़ टन तक जा सकता है। रखने की जगह नहीं है इसलिए समाज कल्याण के कामों में लगाने और विविध रूपों में निर्यात करने के अवसर बढ़ रहे हैं। काम के बदले अनाज और बच्चों को पाठशालाओं में नाश्ता कराने व खाना खिलाने के कार्यक्रम पूरे देश में चलाए जा सकेंगे। यह एक तरह से दूसरी कृषि क्रांति का ही नतीजा है कि हम 101 करोड़ से जयादा आबादी को अपने खेतों में उपजाई फसल से ही खाद्यान्न उपलब्ध करा रहे हैं। खाने वाले तेल की कुछ वर्ष पहले कमी हुई थी। हमने पुरजोर कोशिश की। पिछले कुछ वर्षों में आयात तो घटाकर प्रति वर्ष 300 करोड़ रुपए का हो गया, वहीं तिलहनी फसलों और उनसे उत्पन्न पदार्थों का निर्यात आठ गुना बढ़कर 2500 करोड़ रुपए से भी ऊपर हो गया। यह सब फल है किसानों, वैज्ञानिकों एवं प्रसार कार्यकर्ताओं के अथक प्रयास का। इस प्रगति में आज कृषि वैज्ञानिकों का योगदान किसी से छुपा नहीं है, इसे सारी दुनिया मानती है। जहाँ भी भूख है, वहाँ लोग भारत की मिलास देते हैं कि देखो इस महान देश ने भूख की चुनौती का किस तरह डटकर सामना किया। आज जब निर्यात के अवसर खुले हैं, विश्व का परिवेश बदल रहा है। सारी दुनिया के बाजार खुल गए हैं। सौभागय से दुनिया में शाकाहर भी बढ़ रहा है। इस समय हमारे विविध व्यंजनों को विश्व बाजार में प्रचलित करने के बड़े मौके हैं।

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