Date And Time

RSMSSB Hindi Dictation 100wpm 1000 word in hindi steno #06

RSMSSB Hindi Dictation 100wpm 1000 word in hindi steno #06


Lesson Start

 जब किसी जाति या समाज में किसी विशेष अवसर पर कोई कार्य विशेष ढंग से किया जाता है तो वह प्रथा बन जाता है। प्रथा समाज की परिपाटी का उत्कृष्ट रूप है। परिपाटी का यह रूप सारे समाज या देश से मान्य हो जाता है तथा परिपाटी के उल्लंघन को अनुचित या दूषित माना जाता है। प्राचीन काल में दहेज एक सात्विक प्रथा थी। माता-पिता अपनी कन्या को विवाह के पश्चात् उसके पति के घर खाली हाथ भेजना अच्छा नहीं समझते थे, इसलिए वे वर-वधू के कल्याण के लिए धन, संपत्ति तथा उपहार कन्या के साथ भेजते थे। माता-पिता अपनी पुत्री एवं दामाद की भलाई के लिए जो कुछ भी देते थे, उसे उनका त्याग माना जाता था। कन्या विवाह के पश्चात् अपने साथ वस्त्र, आभूषण, बर्तन आदि पति के घर ले जाती थी। पार्वती के विवाह में उनके पिता हिमाचल ने उन्हें बहुत सारा दान-दहेज देकर विदा किया था। इसी प्रकार से सीता के विवाह में उनके पिता राजा जनक ने उन्हें बहुत सारा दहेज देकर विदा किया था। राजा जनक ने दहेज में कई लाख गायें, अच्छी-अच्छी कई कालीनें, करोड़ों रेश्मी और सूती वस्त्र, गहनों से सजे हाथी, घोड़े, रथ, पैदल तथा सैनिक भेंट में दिए थे। रामायण के अनुसार राजा जनक ने अपनी पुत्रियों की शादी में उनकी सहेली के रूप में सौ-सौ कन्यायें तथा उत्तम दास-दासियाँ अर्पित की थीं। इसके अलावा राजा जनक ने सबके लिए एक करोड़ स्वर्ण मुद्रा, रजत मुद्रा, मोती तथा मूंगे भी दिए। प्रत्येक माता-पिता की यही शुभ इच्छा होती है कि उसके पुत्र-पुत्रियाँ सुख से जीवन व्यतीत करें। अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए माँ-बाप क्या नहीं करते, वे पुत्र-पुत्रियों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करते हैं। पुत्र तो कोई नौकरी या व्यापार आदि संभालकर वृद्ध माता-पिता को सहयोग देते हैं जबकि पुत्रियाँ विवाहोपरांत अपने माता-पिता की खुश-खेराफत पूछने के लिए मायके आती रहती हैं। हर माँ-बाप यही चाहता है कि उसकी पुत्री का विवाह अच्छे से अच्छे घर में हो, जहाँ उसे किसी किस्म की कोई तकलीफ न हो। इसके लिए वर पढ़ा-लिखा, कुशल और समझदार देखा जाता है। उसका कुल-खानदान भी देखा जाता है। जब वर पक्ष की ओर से लड़की के माता-पिता संतुष्ट हो जाते हैं तो दहेज इत्यादि की बात होती है। अधिकांश युवकों के माता-पिता दहेज के इतने लालची होते हैं कि कन्या के गुण-अवगुणों एवं उसके कुल-खानदान की परवाह न करते हुए दहेज की मोटी रकम की माँग लड़की के पिता के सामने रख देते हैं। लड़कियों के माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बराबर की हैसियत वाले व्यक्ति के पुत्र से अपनी कन्या का विवाह करें, वरना बाद में लड़की के साथ बहुत दिक्कत आती है। कारण यह है कि अधिक धनवान और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की दहेज की माँगें भी ज्यादा होती हैं। यदि उनको उनकी मर्जी के अनुसार दहेज न दिया जाए तो वे लड़की यानी बहू को बहुत परेशान करते हैं। बात-बात पर बहू के माता-पिता के ऊपर ताने करते हैं तथा कुछ तो इतने क्रूर होते हैं कि वधू को शारीरिक यातना देने से भी नहीं हिचकिचाते, वे पराए घर की बेटी को मार-पीटकर उसकी बुरी हालत कर डालते हैं। उसके हाथ-पैर तोड़ डालते हैं, आँख फोड़ डालते हैं तथा उसके चेहरे पर तेजाब फेंक देते हैं। इससे भी उनके मन की कसर पूरी नहीं हो पाती तो बहू को रसोई में बंद करके मिट्टी का तेल उसके ऊपर छिड़क देते हैं और माचिस की तीली जलाकर उसके शरीर में आग लगा डालते हैं। हमारे देश में आए दिन बहुओं के साथ ऐसी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। कानून में दहेज लेना एक अपराध माना गया है तथा दहेज लोभियों के लिए कानून में दण्ड का भी प्रावधन है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498ए के अंतर्गत यदि किसी स्त्री का पति या पति का कोई रिश्तेदार स्त्री के साथ निर्दयता का या क्रूरता का व्यवहार करता है तो अपराधी पाए गए व्यक्तियों को तीन साल की कैद एवं जुर्माने से भी दण्डित किया जाएगा। इस तरह का क्रूरतापूर्ण व्यवहार दहेज के कारण भी किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार धारा 498ए एक नए अपराध का सृजन करती है जिससे हमारी अपराध विधि पूर्व में परिचित नहीं थी। समाज में आए दिन विवाहित स्त्रियों को दहेज हेतु परेशान करने तथा बढ़ती दहेज हत्याओं पर रोक लगाने हेतु यह नई धारा जोड़ दी गई है। इसके अंतर्गत निश्चित या क्रूरता शब्द को एक नया आयाम दिया गया है ताकि समाज में दहेज प्रताड़नाओं को दण्डित किया जा सके। आज की पढ़ी-लिखी नारी अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति जागरूक है। उसे मनमाने ढंग से दहेज की आग में नहीं झोंका जा सकता। वह ऐसे पति या सास-ससुर को पसंद नहीं करती जो दहेज के लोभी हों। दहेज प्राप्ति की इच्छा वस्तुतः धन की भूख है। कठोपनिषद् के अनुसार धन से धन की भूख कभी तृप्त नहीं होती, बल्कि बढ़ती है। जब हमारे देश के युवक-युवतियों के मन में दहेज विरोधी भावना पैदा होगी, तभी दहेज के अभिशाप से हमारे समाज को छुटकारा मिल सकता है।

जो लोग अपने पुत्र की शादी में दहेज पूरा न मिलने के कारण वधू पर अत्याचार करते हैं, वे इंसान या मानव नहीं, शैतान हैं। हमारे गौरवशाली भारत देश के लिए दहेज की कुप्रथा एक रीति या परंपरा नहीं बल्कि अभिशाप बन चुकी है। शिष्ट मानव समाज की दहेज अशिष्ट प्रथा है। दहेज के अभिशाप का एक पहलू वधू को शारीरिक तथा मानसिक प्रकार की यातनाएँ देना है। वधू के साथ जब दहेज कम आता है तो ससुराल पक्ष के लोग छोटी-छोटी बात को लेकर घर में कलह पैदा करते हैं, बहू के माता-पिता को ताने देते हैं।

SSC {C & D}, RSMSSB, HIGH COURT, RAILWAY, PARLIAMENT, RPORTER, DSSB, SSB, CRPF ASI, DRDO, BSF ETC. 

You can visit our website for all these dictations and outlines.

Tags

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.