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Ssc dictation for steno in hindi pdf download

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 मानव संसाधन विकास मंत्री जी ने राज्य सभा द्वारा पारित निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार विधेयक इस सदन में प्रस्तुत किया है। यह विधेयक आज से काफी वर्ष पहले ही आ जाना चाहिए। था, लेकिन बहुत विलंब से प्रस्तुत किया गया है। इसलिए इसके लिए ‘‘देर आये दुरुस्त आये‘‘ वाली कहावत चरितार्थ होती हे। यह विधेयक गत वर्ष राज्य सभा में प्रस्तुत किया गया, जिसे विचार के लिए मानव संसाध मंत्रालय से सम्बद्ध स्थायी संसदीय समिति को सौंप दिया गया। समिति ने विधेयक के कतिपय प्रावधानों में संशोधन का सुझाव दिया था, जिसे सरकार ने विधयेक में समाहित कर लिया है। इस विधेयक से 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की उम्र के प्रत्येक बालक-बालिका के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रस्ताव किया गया है।

जहां तक बाल शिक्षा का प्रश्न है, सरकार ने अभी तक जितने भी प्रयास किए, वे सफल नहीं हो सके। सरकार को उम्मीद थी कि स्कूलों में मध्या भोजन कार्यक्रम से पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ेगी, किंतु इसके नतीजे बहुत आशाप्रद नहीं रहे हैं। इस देश की विडम्बना है कि विधेयक पारित हो जाते हैं, कानून बन जाते हैं लेकिन उनका कार्यान्वयन आधा-अधूरा किया जाता है।

सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद देश के लगभग 40 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। इसका कारण गरीबी ही है। बस्तुतः निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तभी लाभकारी हो सकती है, जब उनकी गरीबी दूर की जाए। बाल शिक्षा के क्षेत्र में अनेक बााएं हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। समाज में साधन-संपन्न तबकों के बच्चे भारी धन व्यय करके अच्छी शिक्षा प्राप्त करते हैं किंतु सामान्य परिवारों के बच्चे इससे वंचित रहते हैं। सरकार के प्राथमिक स्कूलों की स्थिति बदतर है। कहीं भवन हैं तो शिक्षक नहीं है और कहीं शिक्षक हैं तो भवन नहीं है। कहीं-कहीं तो ब्लैक बोर्ड, टाटपट्टी और लिखने की चाॅक तक नहीं है। अप्रशिक्षित शिक्षकों की भरमार है। इस समय शिक्षा में जो असमानता है, वह दो तरह की पीढ़ी का निर्माण कर रही हे। मौलिक शिक्षा के अधिकार के रूप में केवल निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा ही नहीं, समान शिक्षा को भी समाहित करना चाहिए।

सार्वभौम शिक्षा की जब बात उठती है तब इतना तो स्पष्ट हो जाना चाहिए। कि यह कोई मुफ्त में बँटने वाली खैरात नहं, बल्कि अधिकार की बात है। सबको आठवीं पास करा देने की खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा। गुणवत्तयुक्त शिक्षा और यथासंभव समान गुणवत्ता की शिक्षा ही सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के तकाजे पर खरी उतर पाएगी। इस संदर्भ में कोठारी कमीशन की समान स्कूल प्रणाली की सिफारिशों पर फिर ध्यान देने की जरूरत है। मौजूदा समय में तो पैसों से खरीदी जाने वाली तरह-तरह की गुणवत्ता की शिक्षा का बाजार खुला है अैर अमीर-गरीब की शिक्षा में भारी विषमता है। इससे समाज में असंतोष फैलता रहा है। शिक्षा की बात करते हुए शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर दिया जाना चाहिए और समतापूर्ण स्थितियाँ लाने के सजग प्रयास होने चाहिए। एक तरफ समतायुक्त शिक्षा की बात होती है, दूसरी तरफ शिक्षा की खरीद-फरोख्त बदस्तूर जारी है। सबके लिए समान गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि शिक्षा के निजीकरण का विरोध किया जाए।

इस हकीकत को याद रखना जरूरी है कि अनेक बच्चों के सामने बचपन से ही जीवन की यह बुनियादी चुनौती उपस्थित होती हे कि अपना और अपनों को पेट कैसे पाला जाए? क्या शिक्षा उनके पेट पालने में सहायक होगी? मध्याव्यहन भोजन योजना तो तत्काल उनकी भूख ही शांत कर सकती है, क्या शिक्षा प्रक्रिया उन्हें इस योग्य बना पाती है कि वे भूख की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ सकें? गरीब माँ-बाप बड़ी उम्मीद से अपने बच्चे को स्कूल भेजते हैं कि पढ़-लिखकर वह कुछ बन जाएगा, गरीब नहीं रहेगा, कुछ कमा पाएगा। कितने गरीब माता-पिताओं की ये इच्छाएँ पूरी हो पाती हैं? भेदभावपूर्ण और अरुचिकर शिक्षा के कारण शिक्षा जारी न रख पाने वाले कितने ही ऐसे बच्चे हें जो न तो बेहतर कमाने लायक बन पाते हें और न ही हाथ के कामों में उनकी रुचि शेष रह जाती है। शिक्षा की गुणवत्ता ऐसी होनी चाहिए कि कोई गरीब वास्वत में इससे आर्थिक रूप से लाभन्वित होता महसूस कर सके।

सरकार के शिक्षा के इस वर्ष के बजट प्रावधान को देखकर ऐसा नहीं लगता कि सरकार इस विधेयक को पारित कराने के पश्चात इसे पूरे मन से लागू कर पाएगी क्योंकि कोठारी कमीशन ने शिक्षा के संबंध मं अपनी सिुारिशों में प्रमुख रूप से हय सिुारिश की थी कि सरकार को अपनी जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर प्रतिवर्ष व्यय करना चाहिए, लेकिन आज देश की आजादी के 62 वर्षों के पश्चात भी हम शिक्षा पर 6 प्रतिशत व्यय कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इसे आधे-अधूरे मन से लागू करना चाहती है जिससे इस विधेयक का उद्देश्य सफल नहीं होगा। सबको मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा पाने का यह अधिकार तभी साकार हो पाएगा, जब इसके लिए पर्याप्त वित्तीय और संस्थागत संसाधन हों और जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए न सिर्फ कार्यक्रम बनें, बल्कि वे कड़ाई से लागू भी किए जाएँ। हमारे देश में छुआछुत, सती प्रथा, बाल विवाह और दहेज उन्मूलन जैसे दर्जनों समाज सुधार और विकास के कानून हैं, लेकिन जब भी कोई हादसा होता है तो वे निष्फल पाए जाते हैं। सर्व शिक्षा अभियान सहित साक्षरता के तमाम कार्यक्रम भी विफलता की कहानी बनकर रह गए हैं।

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